Written By Ritesh Gupta
"ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनं।
उर्वारुकमिव बंधनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।"
कुमाऊँ श्रृंखला के पिछले लेख सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....10) में मैंने प्रसिद्ध पर्वतीय स्थल कौसानी और बैजनाथ मंदिर यात्रा का वर्णन किया था । इस कुमाऊँ श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए चलते हैं, कुमाऊँ का एक ऐसा स्थान पर जहाँ पर भगवान शिव अपने तैतीस करोड़ देवी-देवताओं के साथ पहाड़ के गर्भ में पाताल के अंदर एक गहरी गुफा में विराजमान हैं, उस जगह का नाम हैं "पाताल भुवनेश्वर" । आईये अब चलते हैं, पाताल भुवनेश्वर की अचंभित कर देने वाली पवित्र और रहस्मयी गुफा की यात्रा पर ।
समय लगभग दिन के सवा ग्यारह बजे का होगा । बागेश्वर के सर्विस सेंटर में टैक्सी कार को सही कराने के बाद हम लोग गाड़ी की खराब होने वाली समस्या से चिंता मुक्त होने के बाद अपने आगे की यात्रा पर चल दिए । यहाँ से हम लोगो का अगला कदम पाताल भुवनेश्वर जाकर पाताल में स्थित पवित्र गुफा के दर्शन करने का था । बागेश्वर के चौराहे पर आने के बाद थोड़ा आगे जाकर सरयू नदी पर बने पुल को पार करने बाद इसी रास्ते पर चलते रहे । यह सड़क मार्ग काफी अच्छा, सपाट, गड्डे रहित और प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर था । रास्ते के दोनो तरफ पाइन के जंगल और उनके बीच से जाता घुमावदार रास्ता और मौसम के ठंडक मन को बड़ा ही सुकुन पंहुचा रही थी ।
बागेश्वर (Bageshwar) से लगभग 45 किमी० दूर रास्ते में चौकोरी (Chaukori) नाम की जगह आयी । ये कुमाऊं के अंतर्गत विकसित होता एक छोटा सा पहाड़ी कस्बा (Hill Station) हैं, जहाँ से बर्फ से ढके दूर हिमालय की मुख्य चोटियों का दर्शन बड़े ही सुन्दर ढंग से होता हैं । चौकोरी से गुजरते समय हमें यहाँ पर कई छोटे-बड़े होटल और खाने के ढाबे - दुकान आदि नजर आई । हम लोग कुछ देर यहाँ पर रुकना तो चाहते थे, पर समय की कमी हमें यह करने की आज्ञा नहीं दी रही थी कि हम लोग कुछ पल इस जगह पर बिताए क्योंकि अभी हमे काफी दूर जाना था और आगे का रास्ता चालक के हिसाब से कुछ जंगली भी था, साथ ही साथ शाम से पहले हमे पाताल भुवनेश्वर पहुँच कर दर्शन भी करने थे, सो कार से चौकोरी के अवलोकन करते हुए हम लोग अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते रहे ।
A Beautiful curve on the way (ये पेड़, पहाड़ और ये रास्ते...अक्सर याद आते हैं ) |
चौकोरी से लगभग 12 किमी० चलने के बाद रास्ते में बेरीनाग (Berinag) एक क़स्बा आया । यह भी एक पहाड़ी छोटा क़स्बा हैं, जहाँ से दो रास्ते जाते हैं, एक रास्ता राईआगर - गंगोलीहाट की तरफ जा रहा था । हम लोग इसी राईआगर - गंगोलीहाट चलते रहे । रास्ते में कार चालक ने बताया की पाताल भुवनेश्वर में ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं हैं, आप लोगो को रास्ते में ही किसी होटल में कमरा ले लेना चाहिये, एक काम करते आगे राईआगर में एक होटल है, आप को पसंद आये तो वही ही रुक जाना, वहाँ से पाताल भुवनेश्वर ज्यादा दूर नहीं हैं, दर्शन करके वापिस आसानी से आ जायेंगे ।
हमने कहा,"ठीक हैं चलो देखते हैं, पर ऐसा नहीं हो सकता की उस जगह पर कोई भी ठहरने व्यवस्था न हो ?"
चालक ने कहा, " हाँ ! हैं तो ! वहाँ पर कुमाऊं मंडल विकास निगम का एक पर्यटक आवास गृह हैं पर यदि वहाँ के कमरे भरे हुये हो तो परेशानी हो जायेगी । "
हमने कहा, " ठीक हैं, पहले राई-आगार में होटल का कमरा देख लेते हैं, बाद में निर्णय करेंगे की क्या करना हैं ? "
Raiagar → A Small Town on the way of Patal Bhuvneswar
(राईआगर- रास्ते में बेरीनाग के बाद पड़ने वाला एक पहाड़ी क़स्बा) |
इसी तरह बात करते और रास्ते के नजारों का अवलोकन करते हुए हम लोग बेरीनाग (Berinag) से लगभग 6 किमी० दूर राईआगर (Raiagar) नाम की जगह पर आ गए । गाड़ी को मुख्य चौराहे पर बने एक होटल के सामने लगा दिया और कार चालक ने इसी होटल में कमरा देखने को हमसे कहा । होटल का नाम तो मुझे याद नहीं पर होटल बाहर से ठीक-ठाक लग रहा था । अंदर जाकर कमरे के बारे में वहाँ के संचालक से मालुम किया तो पता चला की होटल सारे कमरे इस समय खाली ही पड़े थे । हम लोगो ने एक-एक करके कमरो का अवलोकन किया, होटल कमरे हमे सही लगे और किराए के बारे में पूछा तो हमे किराया कमरे के हिसाब से अधिक लगे और होटल का वातावरण देखकर हमारे मन में कुछ असुरक्षा की भावना भी जाग उठी । इसी कारण से हमने इस होटल में कमरे लेने का विचार त्याग दिया । हमने कार चालक से कहा कि हमे तो इस होटल के कमरे पसंद नहीं आये ! एक काम करते हैं, पाताल भुवनेश्वर चलते हैं, जो भी हो वही जाकर देखा जाएगा । कोई न कोई रुकने की व्यवस्था तो हो ही जायेगी ।
कार चालक ने कहा, " ठीक हैं ! अभी दस - पन्द्रह मिनिट के बाद चलते हैं , आप लोग यही गाड़ी के पास मेरी प्रतीक्षा करे, तब तक मैं किसी होटल में खाना खाकर आता हूँ । चाहो तो आप लोग भी कुछ खा लीजिए ।"
इतना कहकर हमारे कार चालक खाना खाने चला गया । चौराहे के पास ही सामने हमे एक हलवाई की एक अच्छी सी दुकान नजर आई । दुकान में जाकर हमे कुमाऊं की प्रसिद्ध मिठाई "बाल मिठाई" नजर आई तो फटाफट से कुछ बाल मिठाई खरीद ली मिठाई । वैसे कही सुना रखा हैं की इस मिठाई का जन्म अल्मोड़ा में ही हुआ था । यह एक प्रकार की आयताकार मिठाई है, जिस पर चीनी के गोल दाने चारों तरफ से चिपके रहते हैं और स्वाद भी इनका बेमिशाल होता हैं । इस विशेष प्रकार की मिठाई का स्वाद हमारे साथ के लोगो को बहुत पसंद आया, बड़े ही चाव से स्वाद लेकर सबने खाया । इसी बीच हमारा कार चालक खाना खाकर आ चुका था और अब समय अपनी आगे की यात्रा पर निकलने का था ।
कार में बैठने के बाद हम लोग गंगोलीहाट (Gangolihat) जाने वाली सड़क मार्ग पर चल दिए । राईआगर से गंगोलीहाट वाला आगे का यह मार्ग काफी जंगली और सड़क बहुत ही उबड-खाबड़ थी, कई-कई जगह से पुलिया टूटी हुई थी । इस प्रकार की सड़क से गुजरना हमारे ले लिए कुछ देर तक परेशानी का सबब बन गया । राईआगर से करीब साढ़े ग्यारह किलोमीटर चलने के बाद हम लोग गुप्तादी (Guptadi Bus Stand) नाम की एक जगह पर पहुँच गए । यही से सीधा रास्ता गंगोलीहाट और बायीं तरफ का रास्ता पाताल भुवनेश्वर की तरफ जा रहा था । हम लोग गंगोलीहाट वाला रास्ता छोड़कर पाताल भुवनेश्वर वाले मोड़ से चल दिए । अब यहाँ से आगे का रास्ता काफी सुकुन भरा, सही सलामत और बढ़िया था । गुप्तादी मोड़ से लगभग आठ किमी० चलने के बाद आखिरकार हम लोगो की यह थकानभरी यात्रा समाप्त हो गयी और लगभग सवा तीन बजे के आसपास हम लोग पाताल भुवनेश्वर (Patal Bhuvneshwar) पहुँच गए ।
पाताल भुवनेश्वर उत्तराखंड के गंगोलीहाट नाम के जगह अंतर्गत पित्थौरागढ़ जिले में आता हैं । काठगोदाम से पाताल भुवनेश्वर की दूरी वाया दन्या, गंगोलीहाट करीब 194किमी०, नैनीताल से वाया अल्मौड़ा 195किमी०, पित्थौरागढ़ से 90किमी० और टनकपुर से वाया चम्पावत, लोहाघाट करीब 180किमी० हैं । पाताल भुवनेश्वर का निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम और टनकपुर हैं । पाताल भुवनेश्वर घने चीड़, देवदार के वन और सुन्दर पर्वत घाटियों के बीच बसा सुरम्य स्थल हैं, जहाँ से हमारे देश के सिरमौर पर्वतराज हिमालय की दूर तक की बर्फ से ढकी मुख्य चोटियों का मनोहारी दर्शन होते हैं । इसी नैसर्गिक सौंदर्य का खजाने के बीच यहाँ का मुख्य आकर्षण है, एक अति-प्राचीन, रहस्यमयी, अद्भुत भूमिगत गुफा जो पहाड़ के अंदर पाताल में लगभग 90 फिट नीचे हैं । यह चूने पत्थर की प्राचीन गुफा भगवान शिव और तैतीस करोड़ देवी-देवताओ को समर्पित हैं और हिंदू धर्म में वर्णित पौराणिक गाथाओ को दर्शाते नजर आते हैं । इस गुफा की खोज त्रेता युग राजा ऋतुपर्ण के द्वारा गयी थी । पुनः द्वापर युग इस गुफा की खोज पांडवो के द्वारा की गयी थी ।
नीचे मैंने अपनी नैनीताल से लेकर पाताल भुवनेश्वर तक की पूरी यात्रा सारणी अपनी यात्रा अनुसार लगा रखी है, जो संभवतः आप लोगो के लिए काफी हितकर होगी ।
कार चालक ने कहा, " ठीक हैं ! अभी दस - पन्द्रह मिनिट के बाद चलते हैं , आप लोग यही गाड़ी के पास मेरी प्रतीक्षा करे, तब तक मैं किसी होटल में खाना खाकर आता हूँ । चाहो तो आप लोग भी कुछ खा लीजिए ।"
इतना कहकर हमारे कार चालक खाना खाने चला गया । चौराहे के पास ही सामने हमे एक हलवाई की एक अच्छी सी दुकान नजर आई । दुकान में जाकर हमे कुमाऊं की प्रसिद्ध मिठाई "बाल मिठाई" नजर आई तो फटाफट से कुछ बाल मिठाई खरीद ली मिठाई । वैसे कही सुना रखा हैं की इस मिठाई का जन्म अल्मोड़ा में ही हुआ था । यह एक प्रकार की आयताकार मिठाई है, जिस पर चीनी के गोल दाने चारों तरफ से चिपके रहते हैं और स्वाद भी इनका बेमिशाल होता हैं । इस विशेष प्रकार की मिठाई का स्वाद हमारे साथ के लोगो को बहुत पसंद आया, बड़े ही चाव से स्वाद लेकर सबने खाया । इसी बीच हमारा कार चालक खाना खाकर आ चुका था और अब समय अपनी आगे की यात्रा पर निकलने का था ।
कार में बैठने के बाद हम लोग गंगोलीहाट (Gangolihat) जाने वाली सड़क मार्ग पर चल दिए । राईआगर से गंगोलीहाट वाला आगे का यह मार्ग काफी जंगली और सड़क बहुत ही उबड-खाबड़ थी, कई-कई जगह से पुलिया टूटी हुई थी । इस प्रकार की सड़क से गुजरना हमारे ले लिए कुछ देर तक परेशानी का सबब बन गया । राईआगर से करीब साढ़े ग्यारह किलोमीटर चलने के बाद हम लोग गुप्तादी (Guptadi Bus Stand) नाम की एक जगह पर पहुँच गए । यही से सीधा रास्ता गंगोलीहाट और बायीं तरफ का रास्ता पाताल भुवनेश्वर की तरफ जा रहा था । हम लोग गंगोलीहाट वाला रास्ता छोड़कर पाताल भुवनेश्वर वाले मोड़ से चल दिए । अब यहाँ से आगे का रास्ता काफी सुकुन भरा, सही सलामत और बढ़िया था । गुप्तादी मोड़ से लगभग आठ किमी० चलने के बाद आखिरकार हम लोगो की यह थकानभरी यात्रा समाप्त हो गयी और लगभग सवा तीन बजे के आसपास हम लोग पाताल भुवनेश्वर (Patal Bhuvneshwar) पहुँच गए ।
पाताल भुवनेश्वर उत्तराखंड के गंगोलीहाट नाम के जगह अंतर्गत पित्थौरागढ़ जिले में आता हैं । काठगोदाम से पाताल भुवनेश्वर की दूरी वाया दन्या, गंगोलीहाट करीब 194किमी०, नैनीताल से वाया अल्मौड़ा 195किमी०, पित्थौरागढ़ से 90किमी० और टनकपुर से वाया चम्पावत, लोहाघाट करीब 180किमी० हैं । पाताल भुवनेश्वर का निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम और टनकपुर हैं । पाताल भुवनेश्वर घने चीड़, देवदार के वन और सुन्दर पर्वत घाटियों के बीच बसा सुरम्य स्थल हैं, जहाँ से हमारे देश के सिरमौर पर्वतराज हिमालय की दूर तक की बर्फ से ढकी मुख्य चोटियों का मनोहारी दर्शन होते हैं । इसी नैसर्गिक सौंदर्य का खजाने के बीच यहाँ का मुख्य आकर्षण है, एक अति-प्राचीन, रहस्यमयी, अद्भुत भूमिगत गुफा जो पहाड़ के अंदर पाताल में लगभग 90 फिट नीचे हैं । यह चूने पत्थर की प्राचीन गुफा भगवान शिव और तैतीस करोड़ देवी-देवताओ को समर्पित हैं और हिंदू धर्म में वर्णित पौराणिक गाथाओ को दर्शाते नजर आते हैं । इस गुफा की खोज त्रेता युग राजा ऋतुपर्ण के द्वारा गयी थी । पुनः द्वापर युग इस गुफा की खोज पांडवो के द्वारा की गयी थी ।
नीचे मैंने अपनी नैनीताल से लेकर पाताल भुवनेश्वर तक की पूरी यात्रा सारणी अपनी यात्रा अनुसार लगा रखी है, जो संभवतः आप लोगो के लिए काफी हितकर होगी ।
Distance Chart from Nainital to Patal-Bhuvneshwar as our Journey |
पाताल भुवनेश्वर पहुँचने के बाद सबसे पहले हमारा काम था, ठहरने के लिए एक जगह की तलाश । हमारे कार चालक ने पार्किंग में कार को एक तरह खड़ा करने के बाद कहा कि आप सबसे पहले यह सामने वाले द्वार (पवित्र गुफा तक जाने का प्रथम द्वार, जिस पर लिखा था - समीर द्वार ) से आगे सीढ़ियाँ उतरकर कुछ दूरी पर ही एक कुमाऊं मंडल विकास निगम का पर्यटक आवास गृह है, आप लोग वहाँ जाकर ठहरने के लिए एक कमरे के बारे में मालूम कर लीजिए । मैं और मेरा छोटा भाई अनुज हम दोनो उस आवास गृह की तरफ चल दिए । प्रथम द्वार से सीढ़ियाँ उतरने के बाद दूसरे द्वार के पीछे वाले रास्ते पर ही हमे आवास गृह नजर आ गया । यह पर्यटक आवास गृह पाताल भुवनेश्वर की मुख्य गुफा के जाने वाले पहाड़ी पैदल रास्ते पर ही था । हमने आवास गृह में जाकर एक दिन के लिए कमरे बारे में पूछताछ कि तो पता चला कि इस समय सारे ही कमरे खाली थे । यहाँ के सभी कमरे को देखने के बाद हमें चार बेड वाला एक बड़ा कमरा पसंद आ गया, हमने वहाँ के प्रबंधक से चार बेड के कमरे के लिए किराए की जानकारी ली तो उसने उस कमरे का किराया रूपये 1400/- और डबल बेड वाले कमरे का किराया रूपये 900/- बताया और कहा कि इस किराए पर सेवा शुक्ल (Service Tax) अलग से देना होगा । हमने उस प्रबंधक से कुछ मोलभाव करने की कोशिश की तो उसने बताया की यह कुमाऊं सरकार के भाव हैं और इसमें कम करने की गुंजाईश हमारे हाथ में नहीं हैं । खैर हमने कुछ अग्रिम राशि देकर और कुछ औपचारिकता पूरी करने के बाद चार बेड वाला कमरा आरक्षित कर लिया ।
First Entrance Gate for Patal Bhuvneshwar Near Parking (यह हैं प्रथम प्रवेश द्वार जहाँ से पवित्र गुफा का रास्ता हैं ) |
A Picture taken from First Entrance Gate
(द्रितीय प्रवेश द्वार के पार्श्व में नजर आता पर्यटक आवास गृह K.M.V.N. ) |
K.M.V.N. Guest House on the way Holy Cave (कुमाऊं मंडल विकास निगम का पर्यटक आवास गृह) |
इस समय पाताल भुवनेश्वर का मौसम काफी खुशगवार था और यहाँ से पहाड़ों नज़ारे भी बहुत खूबसूरत थे । इस आवास गृह से पाताल भुवनेश्वर की अद्भुत पवित्र गुफा पास में ही थी दूरी करीब दो या ढाई सौ मीटर होगी । यहाँ से आगे का रास्ता सीमेंट की टाइल्स बना हुआ एक पैदल मार्ग था, जो पहाड़ पर घुमाव लेते हुए घने देवदार, चीड़ के वृक्षों के मध्य से गुजर रहा था । यूँही रास्ते के प्राकृतिक सुषमा का आनंद लेते हुए और तरह से तरह से इन नजारों के बीच फोटो खींचते हुए, गुफा तक जाने वाले तीसरे और अंतिम द्वार पर पहुँच गए । इस तीसरे द्वार से लेकर गुफा तक रास्ता घने देवदार के वृक्षों के बीच में था, जो इतने घने थे की एकबारगी संध्या वेला का सा अहसास करा रहे थे ।
Amazing Valley view toward the Patal Bhuvneswar Cave
( द्रितीय और तृतीय प्रवेश द्वार के बीच पहाड़ी ढलान का खूबसूरत नजारा ) |
Patal Bhuvneswar Temple & Entrance of Holy cave
(पाताल भुवनेश्वर का मंदिर और यही से प्रवेश किया जाता हैं पवित्र गुफा में....) |
पाताल भुवनेश्वर की गुफा मंदिर पर पहुँचने के बाद गुफा में प्रवेश के लिए प्रवेश शुक्ल देना होता हैं, जो गुफा बाहर ही एक काउंटर पर जमा कर रसीद मिल जाती हैं । हम लोगो ने काउंटर के पास ही एक छोटे से मंदिर में भगवान शिव को प्रणाम किया और काउंटर पर पहुंचकर पांच रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से प्रबेश शुल्क और तीस रूपये गाइड शुल्क का भुगतान कर रसीद ले ली साथ ही साथ उन्होंने हमारे सभी मोबाइल और कैमरा भी वही काउंटर पर जमा कर लिए, इसका सीधा सा मतलब था की गुफा के अंदर चित्र खींचने पर प्रतिबन्ध हैं । इस समय मंदिर परिसर में ज्यादा भीड़ नहीं थी, कुछ लोग ही दर्शन के लिए आये हुए थे । पाताल भुवनेश्वर की खोज और इसके इतिहास के बारे में मंदिर की दीवार पर एक शिलालेख लगा हुआ था, जिसका एक चित्र में अपने कैमरे से खीच लिया था । आप पाताल भुवनेश्वर की खोज और इसके इतिहास के बारे नीचे दिए गए चित्र से पढ़कर जान सकते हैं ।
A Information Board about Patal Holy Cave (पाताल भुवनेश्वर के बारे में जानकारी देता बोर्ड) |
अपनी पादुकाए वही मंदिर के बाहर उतराने के बाद गुफा के प्रवेश द्वार पर पहुँच गए । गुफा में प्रवेश करने से पहले हमारी सुरक्षा के लिहाज जाँच कि गयी उसके
बाद हमारे रसीद पर गाइड का नाम लिखा हुआ था, सो गाइड (उसका नाम शेर सिंह
था ) साथ ही प्रवेश करना था सो शेर सिंह के आते ही हम लोग गुफा के अंदर चल
दिए । पाताल भुवनेश्वर की इस गुफा का प्रवेश द्वार बहुत सँकरा और नीचे की तरफ जा था । गुफा के चिकने पत्थर पर फिसलने
से बचने के लिए एक लोहे की मोटी चेन बंधी हुयी थी जिसे आराम-आराम से
पकड़-पकड़ कर गुफा के अंदर "जय पाताल भुवनेश्वर की " नारा लगाते हुए पैर आगे
और सर पीछे की तरफ लगभग आधी लेटे अवस्था में पीछे के तरफ झुककर चलते रहे । जैसे - जैसे हम लोग चलते चले जा रहे थे ऐसा लग रहा था हम लोग धरती की गोद में पाताल के अंदर समाते चले जा रहे हो । गुफा का रास्ता कुछ नमी और लोगो के गुजरने के कारण चिकना और कुछ फिसलन भरा था, हम लोग सावधानी से अपना पैर जमा कर चले जा रहे थे, फिर भी एक बार मेरा पैर फिसला भी पर चैन से पकड़े होने के कारण बच गए । जैसे-जैसे हम लोग अंदर चलते चले जा रहे थे वैसे-वैसे ही रोमांच अपने चरम बिंदु पर पहुचता जा रहा था ।
धीरे-धीरे सावधानी से अपने बच्चो के साथ उन्हें सँभालते हुए हम लोग गुफा के
रास्ते लगभग अस्सी (80) फिसलन भरी सीढ़ियाँ (जो असमान ऊँचाई की थी) उतरते
हुए पाताल के अंदर गुफा में पहुँच गए । अंत की कुछ पांच-छह सीढ़ियाँ कुछ ज्यादा ही ऊँचाई वाली थी, जिससे गुजरने में कुछ परेशानी हुयी पर यहाँ पहुचने का हमारा अनुभव भी एक रोमांच की पराकाष्ठा ही थी ।
A Narrow entrance to go inside cave (गुफा का बहुत ही संकरा रास्ता) |
गुफा के अंदर रौशनी के लिए बल्ब / सीएफल से प्रकाश की व्यवस्था की गयी थी, लाईट जाने की स्थिति में इन्वर्टर की भी व्यवस्था थी । गुफा के अंदर पहुँचने के बाद हमे वाकई में अहसास हुआ की यह एक अद्भुत और रहस्यमयी गुफा है । सबसे बड़ी आश्चर्य की बात यह थी पाताल के इतने अंदर होने के बाबजूद यहाँ पर घुटन नहीं होती बल्कि असीम शांति, ठंडक और एक नई ताजगी का अहसास होता हैं । कुछ देर बाद ही एक और परिवार के आने के बाद हमारे गाइड शेर सिंह ने उनको साथ लेकर हमारे गाइड शेर सिंह हमे गुफा अवलोकन कराने लगे । आप भी चलिए हमारे साथ इस भगवान शंकर और उनके तैतीस करोड़ देवी-देवताओ की नगरी पवित्र गुफा के दर्शन पर ।
पाताल की यह गुफा काफी लंबी हैं, और गुफा अंदर प्रकृति के द्वारा चूने-पत्थर से निर्मित विभिन्न प्रकार की अद्भुत संरचनाये दृष्टिगोचर होती है और युगों-युगों का इतिहास एक साथ हमारे प्रकट हो जाता है । गुफा की हर संरचनाये हमारे ग्रन्थ-पुराण में वर्णित कथाओं और घटनाओ को सहज हमारे प्रस्तुत करते हुए हमे उनकी सच्चाई और वास्विकता का प्रमाण देती हैं । गुफा की दीवारों पर उभरी पत्थरों की यह सरंचनाये, एक बड़ी संख्या में हिंदू धर्म के सभी मंदिरो के तैतीस करोड़ देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करती नजर आती है । गुफा में बने पत्थरों के ढांचे हमारे देश के आध्यात्मिक वैभव की पराकाष्ठा के विषय में हमे सोचने को मजबूर करती हैं और गुफा के स्थापत्य को देख दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर कर देती है ।
गुफा में आगे बढ़ते हुए गाइड के अनुसार गुफा की शुरुआत में शेषनाग के कई फनों की तरह उभरी संरचना पत्थरों पर नज़र आती है । मान्यता यह है कि धरती इसी शेषनाग जी के फन पर टिकी हुई है । गुफा के अंदर यदा-कदा कई जगह से पानी की बूंदे गिरती हुयी और दीवारों पर रिसती हुई नजर आती आती हैं । आगे बढ़ते हुए हमें एक छोटा सा हवन कुंड दिखाई देता है । कहा जाता है कि राजा परीक्षित को मिले श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके पुत्र जन्मेजय ने इसी कुण्ड में सभी नागों को जला डाला परंतु उनमे से एक तक्षक नाम का नाग बच निकला, जिसने बदला लेते हुए परीक्षित को मौत के घाट उतार दिया था । उस हवन कुण्ड के ऊपर इसी तक्षक नाग की आकृति बनी है । हवन कुण्ड से आगे चलते हुए हम लोगो ऐसा महसूस हुआ की जैसे हम किसी की हडिडयों पर चल रहे हों, बताया गया कि यह हड्डियों की आकृति उन्ही मारे गए नागों की है ।
सामने की दीवार पर काल भैरव की जीभ की आकृति दिखाई देती है, जैसे यह किसी काल की सूचना दे रही हो । गुफा थोड़ा आगे बढने एक सर की आकृति का बड़ा बड़ा पिंड नजर आता हैं यह सर किस देवता का इसके पता नहीं । इससे आगे एक देवता के सर के आकार का पिंड नजर आता है जिसे ब्रह्मा का सर माना जाता है । इस पिंड पर हजारों पंखुड़ी वाले कमल की आकृति से पानी इस पिंड पर टपकता है, कहते है की इस कमल से अमृत मिले पानी की बूंदे इस पिंड पर टपकती है । कुछ आगे मुड़ी गरदन वाला गरुड़ की मूर्ति एक पानी के छोटे से कुण्ड के ऊपर बैठा दिखाई देता है । माना यह जाता है कि भगवान शिवजी ने इस कुण्ड को अपने नागों के पानी पीने के लिये बनाया था और इसकी देखरेख गरुड़जी के हाथ में सौपी थी । लेकिन जब गरुड़जी ने जब ही इस कुण्ड से पानी पीने की कोशिश की तो भगवान शिवजी ने गुस्से में आकार उनकी गरदन मोड़ दी थी, यह मुड़ी गरदन वाले गरुड़ की मूर्ति इसी कथा को सत्यता को प्रदर्शित करती है । कुछ आगे जाने एक गुफा की ऊंची दीवार पर जटानुमा सफेद संरचना नजर आती है, जिसमे से बूंद-बूंद पानी रिस रहा था । हमें बताया गया की यह भगवान शिव जटाए हैं और इसमें से अमृत और गंगा जी का प्रवाह हो रहा है ।
यहीं पर एक जलकुण्ड भी है, इसके बारे में मान्यता है की पाण्डवों के प्रवास के दौरान विश्वकर्मा ने उनके लिये कुण्ड बनवाया था । यहाँ से कुछ आगे जाने पर दो खुले दरवाजों के अन्दर संकरा रास्ता जाता है । कहा जाता है की ये धर्म द्वार और मोक्ष द्वार है, जिससे गुजरने से धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती हैं । आगे बढ़ते हुए गुफा में भगवान गणेश जी और कमल की आकृति नजर आती है । अपने गाइड के साथ आगे बढ़ते हुए हमे और भी कई प्रकार की पुराणों से सम्बंधित अलौकिक आकृतिया दृष्टिगोचर होती हैं ।
गुफा के अंदर की अंत की तरफ आगे जाते हुए हमे गुफा की एक तरफ भगवान शिवजी का एक दिव्य तांबे के कवच से घिरा का शिवलिंग नजर आता हैं, बताया गया की यह शिव आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया था, तांबे का कवच से उन्होंने से इस शिवलिंग को ढका था । हमे बताया गया की गुफा के इस आंखिरी छोर पर पाण्डवों ने शिवजी के साथ चौपड़ खेला था । भगवान शिवजी के इस दिव्य शिवलिंग की पूजा अर्चना और दर्शन करने के बाद हम लोग यही से वापिस हो गए । हम लोगो लौटते हुए गुफा के अंदर कई सारे छोटे-छोटे रास्ते जाते दिखाई देते है । गुफा से वापिस आते समय हम लोगो को समुंद्र मंथन से निकले कल्पवृक्ष, हजारों पैर वाले हाथो ऐरावत हाथी के पैर, कामधेनु गाय की थन आदि प्रकार की आकृतियाँ नजर आती हैं । एक स्थान पर बड़े से पत्थर पर चारों युगों के प्रतीक चार छोटे-छोटे खम्बे नजर आते है जिनमे से एक सबसे बड़ा खम्बा धीरे-धीरे ऊपर की तरफ उठ रहा है । माना जाता है की यह सबसे बड़ा खम्बा कलयुग का है और जब यह गुफा की छत से टकरा जायेगा तो इस संसार में प्रलय आ जायेगी । गुफा की शुरुआत पर वापस लौटने पर एक मनोकामना कुण्ड है । मान्यता है की इसके कुण्ड बीच बने छेद से धातु की कोई चीज पार करने पर मनोकामना पूरी हो जाती है ।
इस प्रकार से हमारा इस अद्भुत और रहस्य से भरपूर पवित्र गुफा का दर्शन पूर्ण हो जाता है । गुफा के दर्शन करने के बाद हम लोगो को इस विशेष प्रकार की अनुभूति का अहसास होता है । गुफा दर्शन के बाद गुफा की शुरुआत में पहुँचने वाले हम लोग अंतिम ही लोग थे । हमारा गाइड जल्दी से गुफा के रास्ते से बाहर चला जाता है उसके बाद तभी लाईट चली जाती है और चारों तरफ घनघोर शांति और अँधेरा हो जाता है । कुछ मिनिट बाद लाईट जब वापिस आती है तभी हम लोग गुफा के उसी रास्ते वापिस बाहर आ जाते है ।
पाताल की यह गुफा काफी लंबी हैं, और गुफा अंदर प्रकृति के द्वारा चूने-पत्थर से निर्मित विभिन्न प्रकार की अद्भुत संरचनाये दृष्टिगोचर होती है और युगों-युगों का इतिहास एक साथ हमारे प्रकट हो जाता है । गुफा की हर संरचनाये हमारे ग्रन्थ-पुराण में वर्णित कथाओं और घटनाओ को सहज हमारे प्रस्तुत करते हुए हमे उनकी सच्चाई और वास्विकता का प्रमाण देती हैं । गुफा की दीवारों पर उभरी पत्थरों की यह सरंचनाये, एक बड़ी संख्या में हिंदू धर्म के सभी मंदिरो के तैतीस करोड़ देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करती नजर आती है । गुफा में बने पत्थरों के ढांचे हमारे देश के आध्यात्मिक वैभव की पराकाष्ठा के विषय में हमे सोचने को मजबूर करती हैं और गुफा के स्थापत्य को देख दांतो तले उंगली दबाने को मजबूर कर देती है ।
गुफा में आगे बढ़ते हुए गाइड के अनुसार गुफा की शुरुआत में शेषनाग के कई फनों की तरह उभरी संरचना पत्थरों पर नज़र आती है । मान्यता यह है कि धरती इसी शेषनाग जी के फन पर टिकी हुई है । गुफा के अंदर यदा-कदा कई जगह से पानी की बूंदे गिरती हुयी और दीवारों पर रिसती हुई नजर आती आती हैं । आगे बढ़ते हुए हमें एक छोटा सा हवन कुंड दिखाई देता है । कहा जाता है कि राजा परीक्षित को मिले श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके पुत्र जन्मेजय ने इसी कुण्ड में सभी नागों को जला डाला परंतु उनमे से एक तक्षक नाम का नाग बच निकला, जिसने बदला लेते हुए परीक्षित को मौत के घाट उतार दिया था । उस हवन कुण्ड के ऊपर इसी तक्षक नाग की आकृति बनी है । हवन कुण्ड से आगे चलते हुए हम लोगो ऐसा महसूस हुआ की जैसे हम किसी की हडिडयों पर चल रहे हों, बताया गया कि यह हड्डियों की आकृति उन्ही मारे गए नागों की है ।
सामने की दीवार पर काल भैरव की जीभ की आकृति दिखाई देती है, जैसे यह किसी काल की सूचना दे रही हो । गुफा थोड़ा आगे बढने एक सर की आकृति का बड़ा बड़ा पिंड नजर आता हैं यह सर किस देवता का इसके पता नहीं । इससे आगे एक देवता के सर के आकार का पिंड नजर आता है जिसे ब्रह्मा का सर माना जाता है । इस पिंड पर हजारों पंखुड़ी वाले कमल की आकृति से पानी इस पिंड पर टपकता है, कहते है की इस कमल से अमृत मिले पानी की बूंदे इस पिंड पर टपकती है । कुछ आगे मुड़ी गरदन वाला गरुड़ की मूर्ति एक पानी के छोटे से कुण्ड के ऊपर बैठा दिखाई देता है । माना यह जाता है कि भगवान शिवजी ने इस कुण्ड को अपने नागों के पानी पीने के लिये बनाया था और इसकी देखरेख गरुड़जी के हाथ में सौपी थी । लेकिन जब गरुड़जी ने जब ही इस कुण्ड से पानी पीने की कोशिश की तो भगवान शिवजी ने गुस्से में आकार उनकी गरदन मोड़ दी थी, यह मुड़ी गरदन वाले गरुड़ की मूर्ति इसी कथा को सत्यता को प्रदर्शित करती है । कुछ आगे जाने एक गुफा की ऊंची दीवार पर जटानुमा सफेद संरचना नजर आती है, जिसमे से बूंद-बूंद पानी रिस रहा था । हमें बताया गया की यह भगवान शिव जटाए हैं और इसमें से अमृत और गंगा जी का प्रवाह हो रहा है ।
यहीं पर एक जलकुण्ड भी है, इसके बारे में मान्यता है की पाण्डवों के प्रवास के दौरान विश्वकर्मा ने उनके लिये कुण्ड बनवाया था । यहाँ से कुछ आगे जाने पर दो खुले दरवाजों के अन्दर संकरा रास्ता जाता है । कहा जाता है की ये धर्म द्वार और मोक्ष द्वार है, जिससे गुजरने से धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती हैं । आगे बढ़ते हुए गुफा में भगवान गणेश जी और कमल की आकृति नजर आती है । अपने गाइड के साथ आगे बढ़ते हुए हमे और भी कई प्रकार की पुराणों से सम्बंधित अलौकिक आकृतिया दृष्टिगोचर होती हैं ।
गुफा के अंदर की अंत की तरफ आगे जाते हुए हमे गुफा की एक तरफ भगवान शिवजी का एक दिव्य तांबे के कवच से घिरा का शिवलिंग नजर आता हैं, बताया गया की यह शिव आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया था, तांबे का कवच से उन्होंने से इस शिवलिंग को ढका था । हमे बताया गया की गुफा के इस आंखिरी छोर पर पाण्डवों ने शिवजी के साथ चौपड़ खेला था । भगवान शिवजी के इस दिव्य शिवलिंग की पूजा अर्चना और दर्शन करने के बाद हम लोग यही से वापिस हो गए । हम लोगो लौटते हुए गुफा के अंदर कई सारे छोटे-छोटे रास्ते जाते दिखाई देते है । गुफा से वापिस आते समय हम लोगो को समुंद्र मंथन से निकले कल्पवृक्ष, हजारों पैर वाले हाथो ऐरावत हाथी के पैर, कामधेनु गाय की थन आदि प्रकार की आकृतियाँ नजर आती हैं । एक स्थान पर बड़े से पत्थर पर चारों युगों के प्रतीक चार छोटे-छोटे खम्बे नजर आते है जिनमे से एक सबसे बड़ा खम्बा धीरे-धीरे ऊपर की तरफ उठ रहा है । माना जाता है की यह सबसे बड़ा खम्बा कलयुग का है और जब यह गुफा की छत से टकरा जायेगा तो इस संसार में प्रलय आ जायेगी । गुफा की शुरुआत पर वापस लौटने पर एक मनोकामना कुण्ड है । मान्यता है की इसके कुण्ड बीच बने छेद से धातु की कोई चीज पार करने पर मनोकामना पूरी हो जाती है ।
इस प्रकार से हमारा इस अद्भुत और रहस्य से भरपूर पवित्र गुफा का दर्शन पूर्ण हो जाता है । गुफा के दर्शन करने के बाद हम लोगो को इस विशेष प्रकार की अनुभूति का अहसास होता है । गुफा दर्शन के बाद गुफा की शुरुआत में पहुँचने वाले हम लोग अंतिम ही लोग थे । हमारा गाइड जल्दी से गुफा के रास्ते से बाहर चला जाता है उसके बाद तभी लाईट चली जाती है और चारों तरफ घनघोर शांति और अँधेरा हो जाता है । कुछ मिनिट बाद लाईट जब वापिस आती है तभी हम लोग गुफा के उसी रास्ते वापिस बाहर आ जाते है ।
गुफा के बारे जानकारी यू-ट्यूब का एक लिंक आप भी देखे
चलिए कुमाऊँ श्रृंखला के इस पाताल भुवनेश्वर वाले इस लेख और सफ़र यही विश्राम दे देते है । जल्द ही अपनी इस "कुमाऊँ श्रृंखला" के अगले यात्रा लेख के नई कड़ी में भगवान शिव के अल्मोड़ा जिला के अंतर्गत "जागेश्वर " यात्रा की बारे अपने अनुभव आपके समक्ष प्रस्तुत करूँगा । अगले लेख तक के लिए आप सभी पाठकों को धन्यवाद और राम -राम ! वन्देमातरमक्रमशः ...........
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
Table of Contents → कुमाऊँ यात्रा श्रृंखला के लेखो की सूची :
1. नैनीताल → प्रसिद्ध पर्वतीय नगर की रेलयात्रा (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का..........1)
2. नैनीताल → हिमालय पर्वत का एक शानदार गहना (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का..2)
3. नैनीताल → शहर के देखने योग्य सुन्दर स्थल (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का....3)
4. भीमताल → सुन्दर टापू वाली कुमायूं की सबसे बड़ी झील (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का…..4) 2. नैनीताल → हिमालय पर्वत का एक शानदार गहना (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का..2)
3. नैनीताल → शहर के देखने योग्य सुन्दर स्थल (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का....3)
5. नौकुचियाताल→ नौ कोने वाली सुन्दर झील ( (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का…..5)
6. सातताल → कुमाऊँ की सबसे सुन्दर झील (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का…..6)
7. नैनीताल → माँ नैनादेवी मंदिर और श्री कैंची धाम (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का…..7)
8. रानीखेत → हिमालय का खूबसूरत पर्वतीय नगर (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का…..8)
9. कौसानी → प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पर्वतीय नगर (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....9)
10. बैजनाथ (उत्तराखंड)→भगवान शिव को समर्पित अति-प्राचीन मंदिर (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....10)
11. पाताल भुवनेश्वर → हिमालय की गोद में एक अद्भुत पवित्र गुफा (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....11)
12. जागेश्वर धाम → पाताल भुवनेश्वर से जागेश्वर धाम यात्रा (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....12)
13. जागेश्वर (ज्योतिर्लिंग)→कुमाऊं स्थित भगवान शिव का प्रसिद्ध धाम के दर्शन (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....13)
14. नैनीताल → खूबसूरत नैनी झील और सम्पूर्ण यात्रा सार (सुहाना सफ़र कुमाऊँ का.....14)
15.आगरा से भीमताल वाया बरेली (Agra to Bhimtal Via Bareilly → Road Review )
16. प्रकृति से एक मुलाक़ात → भीमताल भ्रमण (Bhimtal Lake in Nainital Region)
17. नौकुचियाताल → प्रकृति का स्पर्श (NaukuchiyaTal Lake in Nainital Region )
18. नैनीताल दर्शन → (A Quick Tour to Lake City, Nainital)
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
15.आगरा से भीमताल वाया बरेली (Agra to Bhimtal Via Bareilly → Road Review )
16. प्रकृति से एक मुलाक़ात → भीमताल भ्रमण (Bhimtal Lake in Nainital Region)
17. नौकुचियाताल → प्रकृति का स्पर्श (NaukuchiyaTal Lake in Nainital Region )
18. नैनीताल दर्शन → (A Quick Tour to Lake City, Nainital)
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
kafi dino baad aapki post aayi . badhiya jagah hai ye
ReplyDeleteराम राम जी, लो...आपके द्वारा हम लोगो की भी पाताल भुवनेश्वर की यात्रा हो गयी, कभी जाने की इच्छा हैं, प्रभु ने चाहा तो पुरी हो जायेगी, धन्यवाद, वन्देमातरम....
ReplyDeleteबेहद रोमांचक और धार्मिक जानकारी के लिए आभार
ReplyDeleteO my god ! adbhut! main kyo yahan se wapas aa gai ...bahut bura lag raha hai...
ReplyDeleteकोई बात नहीं जी....अगली बार जरुर जाना...!
Deleteअच्छी जानकारी ...सुंदर चित्र
ReplyDeleteBahut sundar chitr...bahut achchhi jaankari...aabhaar..
ReplyDeleteachchhi jankaari sundar chitra...
ReplyDeleteप्रिय रितेश जी
ReplyDeleteबहुत ही सजीव वर्णन किया है। बहुत सुन्दर लगा।
जन्मेजय के नाग यज्ञ के बारे में जहाँ तक मेरी जानकारी है राजा परिछित की म्रत्यु के बाद जन्मेजय ने यह यज्ञ किया था। जब हजारो - लाखो सर्प इस यज्ञ में भस्म हो गए पर तछ्क नाग भस्म नहीं हुआ तब जन्मेजय ने ऋषि - मुनियों से इसका कारण पूछा तब उन्होंने बताया कि तछ्क नाग इन्द्र के सिंहासन के नीचे छिप कर बैठा है। तब राज जन्मेजय ने ऋषि - मुनियों से कहा कि आप लोग ऐसे मन्त्र पढ़े कि तछक सिंहासन सहित यज्ञ वेदी पर आ जाय।कहते हैं ऋषि - मुनियों ने मन्त्र द्वारा उसका आवाहन किया और इंद्र का सिंहासन तछक सहित यज्ञ वेदी पर आ गया .
तभी वहाँ पर आस्तिक ऋषि ने पहुँच कर इस यज्ञ को रुकवाया था। और इसतरह से तछक को जीवन दान मिला था।
जानकारी के लिए धन्यवाद जी....
Deletejabardast post . majaa aa gayaa . patal bhuvaneshwar par itni gehraai se kisibe jyaada nahi likha hai .
ReplyDeleteTravel India
सजीव वर्णन .... रोमांच कर देने वाले दृश्य ...
ReplyDeleteaabhar intne sundar jagah ki jankari ke liye
ReplyDeleteहम भी इस यात्रा में साथ ही चल रहे है।
ReplyDelete@मनु जी,
ReplyDelete@प्रवीण गुप्ता जी,
@अंजू चौधरी जी,
@दर्शन कौर जी,
@डा. मोनिका जी,
@डा.भावना जी,
@कविता जी,
@रस्तोगी जी,
@विशाल जी,
@दिगंबर जी,
@अरुण जी,
@संदीप जी,
आप सभी का यहाँ आने के लिए और टिप्पणी करने व लेख को पसंद करने के लिए आभार....
धन्यवाद !
बेहतरीन आलेख !
ReplyDeleteधन्यवाद मनीष जी...
Deleteबढिया यात्रा संस्मरण
ReplyDeleteVry nice aap na ek ati prachin dharmik sthal sa parechay karya aap ka dhanayvad......
ReplyDeletekripya ye batyen do ki aap ka kitna kharcha ho gya tha is trip pe
ReplyDeleteaur pure trip aana aur jaana kitne kilometer hoga
kripya batayein
बहुत बढ़िया विवरण... हम यहां 2 बार जा चुके हैं और हर बार प्रसन्न मन से वापिस आये
ReplyDeleteधन्यवाद P.S. Tiwari जी .....
Deleteपोस्ट पर आने और प्रशंसा युक्त टिप्पणी के लिए ...
बहुत बहुत धन्यवाद
ReplyDeleteधन्यवाद
Delete
ReplyDeleteसही ! बहुत दिनों से यहां जाने का मन है भाई ! बहुत कुछ दिशा निर्देश और रास्तों के विषय में जानकारी प्राप्त हुई है आपके ब्लॉग पोस्ट से !!
धन्यवाद योगी सारस्वत जी |
DeleteJald aana hoga mera.. Dekhu shayad duniya ka main uddhaar yahin se kar paaunga..
ReplyDeleteजी बिल्कुल
DeleteRitesh gupta ji apna whatsapp number ublabdh karayein.
ReplyDeletehttps://www.facebook.com/riteshagraup
Deleteकृपया यहाँ पर मैसेज कीजिये
उत्त्तम वर्णन किया है आपने कभी अवसर मिला तो अवश्य वहां जाना चाहूंगा
ReplyDeleteउत्त्तम वर्णन किया है आपने कभी अवसर मिला तो अवश्य वहां जाना चाहूंगा
ReplyDeleteधन्यवाद जी आपका
Deleteबहुत ही रोमांचक वर्णन इस पवित्र गुफा में जाने का सही समय कौन सा है कृपया बताने का कष्ट करें।
ReplyDeleteधन्यवाद जी । अच्छा समय मई-जून या अक्टूबर-नबम्बर के बीच सबसे बढ़िया समय है
Deleteपाताल भुवनेश्वर मंदिर के बारें में अच्छी जानकारी साँझा की है हमारा लेख भी देख सकते है पाताल भुवनेश्वर मंदिर
ReplyDelete